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म्युचुअल फंड रिटर्न की तुलना: टॉप परफॉर्मिंग फंड्स को कैसे पहचानें?

Published on 4 March, 2026

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Deepak

Deepak is a personal finance writer and mutual fund enthusiast based in India. With over 8 years of experience helping salaried investors understand SIPs, ELSS, and goal-based investing, he writes practical guides that make financial planning accessible to everyone.

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याद है वो दिन जब ऑफिस में लंच ब्रेक के दौरान प्रिया, बेंगलुरु में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर, मुझसे पूछ रही थी, “दीपक, यार! मेरे दोस्त राहुल ने बताया कि उसने जिस म्यूचुअल फंड में पैसा लगाया था, उसके रिटर्न पिछले साल 30% से ज़्यादा रहे हैं. मेरा फंड तो मुश्किल से 12-15% दे रहा है. क्या मुझे अपना फंड बदलकर राहुल वाला फंड ले लेना चाहिए?”

मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “प्रिया, रुक जा! बस पिछले साल के रिटर्न देखकर किसी फंड में कूद पड़ना, जैसे बिना मौसम का हाल जाने छाता फेंक देना है. म्युचुअल फंड रिटर्न की तुलना करना सिर्फ़ नंबर देखने से कहीं ज़्यादा है. क्या राहुल ने तुम्हें यह भी बताया कि उसने अपने फंड को कितनी देर तक होल्ड किया है? या उस फंड में रिस्क कितना है?”

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यह सिर्फ प्रिया की कहानी नहीं है. मैंने अपने 8+ सालों के अनुभव में हज़ारों सैलरीड प्रोफेशनल्स को यही गलती करते देखा है. लोग अक्सर सिर्फ़ 'टॉप परफॉर्मिंग फंड्स' के चमकते आंकड़ों को देखते हैं और बाकियों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं. लेकिन क्या यह सही तरीका है?

सिर्फ़ चमकते रिटर्न नहीं, रिस्क भी देखो

चलो, एक पल के लिए मान लेते हैं कि किसी फंड ने पिछले एक साल में धमाकेदार 35% रिटर्न दिए हैं. मुंबई के विक्रम की तरह, जिसकी सैलरी ₹1.5 लाख प्रति माह है, और वो जल्दी अमीर बनने के सपने देखता है. वो ऐसे ही एक फंड में पैसा लगाने को तैयार हो जाता है. लेकिन क्या उसने यह सोचा कि उस रिटर्न के पीछे कितना रिस्क था?

कभी-कभी कुछ फंड्स बहुत ज्यादा रिस्क लेकर शॉर्ट-टर्म में अच्छा रिटर्न दिखा देते हैं. लेकिन मार्केट में ज़रा भी उतार-चढ़ाव आया, तो वे धड़ाम से नीचे गिर सकते हैं. इसे ऐसे समझो – तेज़ दौड़ने वाला हमेशा रेस नहीं जीतता, बल्कि वो जीतता है जो स्थिरता के साथ दौड़ता है और अंत तक अपनी ऊर्जा बचाकर रखता है.

एक अच्छा टॉप परफॉर्मिंग फंड वो होता है जो रिस्क को मैनेज करते हुए लगातार अच्छा रिटर्न दे. सिर्फ़ एक साल का रिटर्न नहीं, बल्कि 3, 5, और 10 सालों का रिटर्न देखो. AMFI या SEBI की वेबसाइट पर आपको फंड्स के बारे में सारी जानकारी मिल जाएगी. यहां आपको हर फंड का रिस्क-ओ-मीटर भी दिखेगा, जो बताता है कि उस फंड में कितना जोखिम है.

'टॉप परफॉर्मिंग फंड्स' की सही पहचान: सिर्फ़ शॉर्ट-टर्म नहीं, लॉन्ग-टर्म देखो

चलो, थोड़ा और गहराई में चलते हैं. जब हम म्युचुअल फंड रिटर्न की तुलना करते हैं, तो अक्सर लोग सिर्फ़ पिछले 1 साल के रिटर्न देखते हैं. यह सबसे बड़ी गलती है!

दिल्ली के अमित ने एक बार मुझसे पूछा, “दीपक भाई, मैंने एक फंड देखा है जिसने पिछले साल Nifty 50 से भी ज़्यादा रिटर्न दिए हैं. क्या वो बेस्ट म्युचुअल फंड रिटर्न देने वाला फंड है?” मैंने उसे समझाया कि स्टॉक मार्केट में कभी-कभी एक या दो सेक्टर बहुत अच्छा परफॉर्म कर जाते हैं, और उस सेक्टर में निवेश करने वाले फंड भी अच्छा करते हैं. लेकिन क्या यह परफॉरमेंस हमेशा बनी रहेगी?

यहां कुछ चीज़ें हैं जो हमें देखनी चाहिए:

  1. कंपाउंडेड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR): यह आपको बताता है कि फंड ने एक निश्चित अवधि (जैसे 3, 5, 10 साल) में औसतन हर साल कितना रिटर्न दिया है. यह सिर्फ़ शॉर्ट-टर्म की चमक नहीं, बल्कि फंड की असली ताकत दिखाता है.
  2. रोलिंग रिटर्न्स (Rolling Returns): यह एक बेहतरीन तरीका है फंड की कंसिस्टेंसी चेक करने का. इसमें आप अलग-अलग स्टार्टिंग और एंडिंग डेट्स के लिए फंड के रिटर्न देखते हैं. जैसे, अगर आप 3 साल के रोलिंग रिटर्न देख रहे हैं, तो आप 2018-2021, 2019-2022, 2020-2023 जैसे अलग-अलग पीरियड्स में फंड का परफॉरमेंस देखते हैं. इससे आपको पता चलता है कि फंड ने हर तरह के मार्केट साइकिल में कैसा परफॉर्म किया है.
  3. बेंचमार्क से तुलना: हमेशा अपने फंड के रिटर्न की तुलना उसके बेंचमार्क (जैसे Nifty 50, SENSEX, Nifty Midcap 100) से करो. अगर फंड लगातार अपने बेंचमार्क को बीट कर रहा है, तो ये एक अच्छा संकेत है.

एक बात हमेशा याद रखना: Past performance is not indicative of future results.

फंड मैनेजर और एक्सपेंस रेश्यो: ये छोटे खिलाड़ी बड़े गेम चेंजर हैं!

जरा सोचो, आपकी टीम का कोच कौन है? अगर कोच अच्छा होगा, तो टीम भी अच्छा परफॉर्म करेगी, है ना? म्युचुअल फंड में फंड मैनेजर भी कुछ ऐसा ही काम करता है. एक अनुभवी और सफल फंड मैनेजर, जिसका ट्रैक रिकॉर्ड अच्छा हो, वो आपके फंड के लिए एक बड़ा प्लस पॉइंट हो सकता है.

चेन्नई में रहने वाले मेरे एक दोस्त, हरीश, ने एक बार मुझसे पूछा, “यार दीपक, सब कहते हैं एक्सपेंस रेश्यो कम होना चाहिए. ये एक्सपेंस रेश्यो क्या बला है?”

मैंने उसे समझाया, “हरीश, एक्सपेंस रेश्यो वो सालाना फीस है जो फंड हाउस आपके निवेश को मैनेज करने के लिए आपसे लेता है. अगर फंड A का एक्सपेंस रेश्यो 0.5% है और फंड B का 1.5% है, तो फंड A आपके लिए हर साल 1% ज़्यादा रिटर्न कमाएगा, बस फीस कम होने की वजह से! सोचो, लॉन्ग-टर्म में ये 1% कितना बड़ा फर्क ला सकता है!”

हालांकि, सिर्फ़ कम एक्सपेंस रेश्यो देखकर फंड मत चुन लेना. अगर कोई फंड थोड़ा ज़्यादा एक्सपेंस रेश्यो लेकर लगातार शानदार रिटर्न दे रहा है, तो वो भी बुरा नहीं है. आपको एक बैलेंस बनाना होगा.

अपने फाइनेंसियल गोल्स के साथ फंड को अलाइन करें

मैं हमेशा कहता हूँ, निवेश की शुरुआत आपके गोल्स से होती है. आपका लक्ष्य क्या है? घर के लिए डाउन पेमेंट? बच्चे की पढ़ाई? रिटायरमेंट? टैक्स बचाना?

अगर आपका लक्ष्य टैक्स बचाना है, तो आप ELSS (Equity Linked Savings Scheme) फंड्स देख सकते हैं, जो सेक्शन 80C के तहत टैक्स बेनिफिट देते हैं और इनमें 3 साल का लॉक-इन पीरियड होता है. अगर आप लॉन्ग-टर्म वेल्थ बनाना चाहते हैं और थोड़ा ज़्यादा रिस्क ले सकते हैं, तो Flexi-cap या Large & Midcap फंड्स अच्छे हो सकते हैं.

जो लोग संतुलित रिटर्न चाहते हैं और रिस्क को भी मैनेज करना चाहते हैं, उनके लिए Balanced Advantage Funds एक अच्छा विकल्प हो सकते हैं, क्योंकि ये इक्विटी और डेट में मार्केट कंडीशन के हिसाब से एलोकेशन बदलते रहते हैं.

अनीता, जो पुणे में एक मार्केटिंग मैनेजर है, उसकी बेटी की पढ़ाई के लिए फंड जमा कर रही थी. उसने मुझसे पूछा, “दीपक, मुझे ऐसा फंड चाहिए जो मेरी बेटी के 15 साल बाद कॉलेज जाने तक अच्छा पैसा बना दे, लेकिन बहुत ज़्यादा उतार-चढ़ाव न हो.” मैंने उसे कुछ लार्ज-कैप फंड्स और इंडेक्स फंड्स देखने की सलाह दी, क्योंकि वे लार्ज-कैप स्टॉक्स में निवेश करते हैं और आमतौर पर मिड या स्मॉल-कैप फंड्स की तुलना में कम वोलाटाइल होते हैं.

क्या गलतियां करते हैं ज़्यादातर लोग?

ईमानदारी से कहूं तो, ज़्यादातर फाइनेंशियल एडवाइजर आपको यह नहीं बताएंगे, लेकिन मैंने देखा है कि लोग अक्सर इन गलतियों में फंस जाते हैं:

  1. FOMO (Fear Of Missing Out): किसी फंड के शॉर्ट-टर्म धमाकेदार रिटर्न देखकर उसमें कूद पड़ना.
  2. एक ही तरह के फंड्स में निवेश करना: अपने पोर्टफोलियो में विविधता नहीं रखना, जैसे सिर्फ़ स्मॉल-कैप फंड्स में पैसा लगाना, जबकि उनकी रिस्क प्रोफाइल अलग हो.
  3. जल्दी-जल्दी फंड बदलना: अगर किसी फंड ने एक-दो तिमाही में कम परफॉर्म किया, तो तुरंत उसे बेच देना. म्युचुअल फंड को काम करने के लिए समय चाहिए होता है.
  4. रिसर्च न करना: सिर्फ़ दोस्त या रिश्तेदार की सलाह पर फंड खरीद लेना, बिना अपनी रिसर्च किए.

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

म्युचुअल फंड में निवेश करने का सही समय क्या है?
म्युचुअल फंड में निवेश का कोई 'सही समय' नहीं होता. SIP (सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान) के ज़रिए नियमित रूप से निवेश करना सबसे अच्छा तरीका है, क्योंकि यह आपको मार्केट के उतार-चढ़ाव का फायदा उठाने में मदद करता है (रुपया लागत औसत). आप जितना जल्दी शुरू करेंगे, कंपाउंडिंग का उतना ज़्यादा फायदा मिलेगा.
क्या मुझे हमेशा 'टॉप परफॉर्मिंग फंड्स' में ही निवेश करना चाहिए?
ज़रूरी नहीं. 'टॉप परफॉरमेंस' अक्सर शॉर्ट-टर्म का होता है और यह स्थायी नहीं होता. आपको ऐसे फंड्स चुनने चाहिए जो आपके वित्तीय लक्ष्यों, जोखिम लेने की क्षमता और निवेश के समय-सीमा (investment horizon) से मेल खाते हों. स्थिरता और कंसिस्टेंसी शॉर्ट-टर्म परफॉरमेंस से ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं.
म्युचुअल फंड में रिटर्न की गणना कैसे की जाती है?
म्युचुअल फंड के रिटर्न की गणना कई तरीकों से की जाती है, जिनमें CAGR (कंपाउंडेड एनुअल ग्रोथ रेट) और एब्सोल्यूट रिटर्न प्रमुख हैं. CAGR लंबी अवधि के लिए औसत वार्षिक रिटर्न दिखाता है, जबकि एब्सोल्यूट रिटर्न निवेश की पूरी अवधि में कुल लाभ या हानि को दर्शाता है. रोलिंग रिटर्न्स भी फंड की कंसिस्टेंसी को मापने का एक अच्छा तरीका है.
मैं अपने म्युचुअल फंड निवेश की परफॉरमेंस को कैसे ट्रैक करूँ?
आप अपने फंड की परफॉरमेंस को नियमित रूप से उसकी NAV (नेट एसेट वैल्यू) को ट्रैक करके, उसके बेंचमार्क से तुलना करके, और रोलिंग रिटर्न्स को देखकर ट्रैक कर सकते हैं. लेकिन याद रखें, हर रोज़ की NAV देखकर घबराना नहीं है. लंबी अवधि के लक्ष्यों के लिए आपको धैर्य रखना होगा.
क्या म्युचुअल फंड में निवेश करने के लिए किसी फाइनेंशियल एडवाइजर की ज़रूरत होती है?
यह आपकी व्यक्तिगत जानकारी और कम्फर्ट लेवल पर निर्भर करता है. अगर आप निवेश के बारे में ज़्यादा नहीं जानते और अपनी वित्तीय योजना बनाने में मदद चाहते हैं, तो एक SEBI-रजिस्टर्ड फाइनेंशियल एडवाइजर से सलाह लेना फायदेमंद हो सकता है. वे आपकी ज़रूरतों के हिसाब से एक कस्टमाइज्ड पोर्टफोलियो बनाने में आपकी मदद कर सकते हैं. अगर आप खुद से रिसर्च करने में सक्षम हैं, तो डायरेक्ट प्लान्स में निवेश करके एक्सपेंस रेश्यो बचा सकते हैं.

तो, अगली बार जब कोई कहे ‘टॉप परफॉर्मिंग फंड्स’...

तो अब आप जानते हैं कि सिर्फ़ चमकते हुए नंबर्स से नहीं बहकना है. किसी भी म्युचुअल फंड रिटर्न की तुलना करते समय, उसकी पूरी कहानी देखो – उसका रिस्क, उसकी कंसिस्टेंसी, उसका फंड मैनेजर, और सबसे ज़रूरी बात, क्या वो आपके लक्ष्यों से मेल खाता है?

सही फंड चुनने के लिए समय निकालना और रिसर्च करना बहुत ज़रूरी है. यह आपकी मेहनत की कमाई का सवाल है, कोई लॉटरी नहीं! SIP के ज़रिए नियमित निवेश करके आप अपने वित्तीय लक्ष्यों को आसानी से हासिल कर सकते हैं. अगर आपको अपने निवेश लक्ष्यों तक पहुँचने के लिए कितने पैसे हर महीने SIP करनी होगी, यह जानना है, तो हमारा SIP कैलकुलेटर आपकी मदद कर सकता है.

यह ब्लॉग पोस्ट केवल शैक्षिक और सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है. यह वित्तीय सलाह या किसी विशिष्ट म्युचुअल फंड योजना को खरीदने या बेचने की सिफारिश नहीं है.

Mutual Fund investments are subject to market risks, read all scheme related documents carefully.

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